सूबे की उच्च शिक्षा व्यवस्था पर हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी अकारण नहीं है। शिक्षा का केंद्र बिंदु शिक्षक होता है लेकिन प्रदेश में उच्च शिक्षा अरसे से गुरुजनों की राह तक रही है। सूबे के राज्य विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के 30 प्रतिशत, राजकीय महाविद्यालयों में 35 फीसदी और अशासकीय सहायताप्राप्त कॉलेजों में 31 प्रतिशत पद खाली हैं।
राज्य विश्वविद्यालयों मे शिक्षकों के 1163 सृजित पदों में से 500 से ज्यादा रिक्त हैं। आगरा के डॉ.भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में शिक्षकों के 46 प्रतिशत पदों को नियुक्तियों का इंतजार है। यहां प्रोफेसर के आधे से अधिक और रीडर के करीब तीन-चौथाई पद खाली हैं। लेक्चरर के एक-तिहाई से अधिक पद रिक्त हैं। मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में शिक्षकों के 38 फीसदी पद रिक्त हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय में शिक्षकों के 26 फीसदी पद रिक्त हैं। यहां प्रोफेसर के 50 प्रतिशत से अधिक, रीडर के 29 प्रतिशत और लेक्चरर के 21 प्रतिशत पद खाली हैं। पं.दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में भी शिक्षकों की कमी का रोना है। यहां शिक्षकों के लगभग 40 प्रतिशत पद रिक्त हैं। विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के तीन-चौथाई, रीडर के लगभग एक-तिहाई और लेक्चरर के 36 फीसदी पद खाली हैं। वहीं वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में अध्यापकों के 40 फीसदी पद खाली हैं। अन्य राज्य विश्वविद्यालयों में भी शिक्षकों के कई पद रिक्त हैं।
सरकार राजकीय महाविद्यालयों की स्थापना तो कर रही है लेकिन उनमें समुचित संख्या में गुरुजन की नियुक्ति नहीं हो पा रही है। राजकीय कॉलेजों में शिक्षकों के 2156 पदों में से 756 पद खाली हैं। यह स्थिति तब है जब राजकीय महाविद्यालयों में संविदा पर तैनात लगभग 350 शिक्षक भी विद्यादान में हाथ बंटा रहे हैं। अनुदानित कॉलेजों का हाल भी बुरा है। इनमें शिक्षकों के 11273 पद सृजित हैं जिनमें से तकरीबन 3500 रिक्त हैं। राज्य विश्वविद्यालय अपने स्तर से शिक्षकों का चयन करते हैं। वहीं राजकीय महाविद्यालयों में शिक्षकों के चयन के लिए सरकार लोक सेवा आयोग को अधियाचन भेजती है। अशासकीय सहायताप्राप्त कॉलेजों में शिक्षकों की नियुक्ति उच्चतर शिक्षा सेवा चयन आयोग द्वारा किये गए चयन के माध्यम से होती है।
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